हर इंसान उम्र के किसी ना किसी पडाव में दंतरोगों से सामना जरूर करता है। दांतों की समस्याओं के निपटारे के लिए यूं तो बाजार में अनेक औषधियाँ उपलब्ध हैं लेकिन जटिल रसायनों और कृत्रिम दवाओं के दुष्प्रभावों से अक्सर लेने के देने पड जाते हैं। प्राचीनकाल से आयुर्वेद जैसे ग्रंथों में भी हर्बल उपचार द्वारा दांतों की समस्या के निपटारे के लिए अनेक नुस्खों का जिक्र किया गया है। सुदूर ग्रामीण अंचलों में आज भी आदिवासी हर्बल नुस्खों का उपयोग कर अपनी दांतो की समस्याओं की विदाई कर देते हैं। चलिए आज जानते हैं दंतरोगों के लिए आदिवासियों द्वारा आजमाए जाने वाले कुछ चुनिंदा हर्बल नुस्खों के बारे में

दंतरोगों के निवारण के लिए आजमाए जाने वाले आदिवासियों के परंपरागत हर्बल ज्ञान का जिक्र कर रहें हैं डॉ दीपक आचार्य (डायरेक्टर-अभुमका हर्बल प्रा. लि. अहमदाबाद)। डॉ. आचार्य पिछले 15 सालों से अधिक समय से भारत के सुदूर आदिवासी अंचलों जैसे पातालकोट (मध्यप्रदेश), डाँग (गुजरात) और अरावली (राजस्थान) से आदिवासियों के पारंपरिक ज्ञान को एकत्रित कर उन्हें आधुनिक विज्ञान की मदद से प्रमाणित करने का कार्य कर रहें हैं।

डाँग- गुजरात के आदिवासी अनंतमूल के पत्तों का उपयोग दंतरोगों के लिए करते है और माना जाता है कि इसके पत्तों को दांतो के बीच दबा लिया जाए तो यह दांत दर्द खींच लेता है।

पातालकोट के आदिवासी महुआ की टहनियों का इस्तमाल दातून की तरह करते है, उनके अनुसार ऐसा करने से दांत मजबूत और मसूडों से खून आना बंद हो जाता है।

अनार के फूल छाया में सुखाकर बारीक पीस लिए जाए और इसे मंजन की तरह दिन में 2 से 3 बार इस्तमाल किया जाए तो दांतों से खून आना बंद होकर दांत मजबूत हो जाते हैं।

दांतों के दर्द में काली मिर्च के काढ़े से कुल्ला करने से फायदा होता है। पातालकोट के हर्बल जानकारों के अनुसार प्रतिदिन रोज सुबह खाली पेट ऐसा करने से दंतरोग होने की संभावनाएं लगभग शून्य हो जाती है।


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