वायु प्रदूषण से जीवाणुओं की क्षमता में वृद्धि होने जाने से सांस संबंधी संक्रमण के इलाज में दी जाने वाली एंटीबॉयोटिक दवाएं बेअसर हो जाती हैं। यह बात एक शोध में सामने आई। 
ब्रिटेन में लीसेस्टर विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर जूली मोरीसे ने कहा, शोध से हमें यह समझने में मदद मिली है कि किस तरह वायु प्रदूषण मानव जीवन को प्रभावित करता है। मोरीसे ने कहा, इससे पता चलता है कि संक्रमण पैदा करने वाले जीवाणुओं पर वायु प्रदूषण का काफी प्रभाव पड़ता है। वायु प्रदूषण से संक्रमण का प्रभाव बढ़ जाता है। 
इस शोध का प्रकाशन पत्रिका 'एन्वायरमेंटल माइक्रोबायोलॉजी' में हुआ है। इसमें बताया गया है कि वायु प्रदूषण कैसे हमारे शरीर के श्वसन तंत्र (नाक, गले और फेफड़े) को प्रभावित करता है। वायु प्रदूषण का प्रमुख घटक कार्बन है। यह डीजल, जैव ईंधन व बायोमास के जलने से पैदा होता है। शोध से पता चलता है कि यह प्रदूषक जीवाणु के उत्पन्न होने और उसके समूह बनाने की प्रक्रिया को बदल देता है। इससे उनके श्वसन मार्ग में वृद्धि व छिपने और हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली से लड़ने में सक्षम हो जाता है।
यह शोध दो मानव रोगाणुओं स्टेफाइलोकोकस अयूरियस और स्ट्रेप्टोकोकस निमोनिया पर किया गया। यह दोनों प्रमुख श्वसन संबंधी रोगकारक हैं जो एंटीबॉयोटिक के प्रति उच्च स्तर का प्रतिरोध दिखाते हैं। शोध दल ने पाया कि कार्बन स्टेफाइलोकोकस अयूरियस के एंटीबॉयोटिक बर्दाश्त करने की क्षमता को बदल देता है। यह स्टेफालोकोकस निमोनिया के समुदाय की पेनिसिलीन के प्रति प्रतिरोधकता को भी बढ़ा देता है। इसके अलावा पाया गया कि कार्बन स्ट्रेप्टोकोकस निमोनिया को नाक से निचले श्वसन तंत्र में फैलाता है, जिससे बीमारी का खतरा बढ़ जाता है।

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