हमारे परिवार, समाज, आस-पड़ोस में आए दिन लड़कियों के प्रति घट रही भेदभाव की घटनाएं हमें झकझोर देती हैं, मजबूर करती हैं सोचने के लिए कि क्या वाकई हम 21वीं सदी की ओर जा रहे हैं...

पिछले दिनों मेरी मुलाकात मध्यप्रदेश के एक शहर में एक सरकारी कर्मचारी से हुई। आम बातचीत में बच्चों के बारे में पूछने पर वो बोला दो बच्चे, मैंने कहा तनख्वाह काफी नहीं होती छोटे परिवार के लिए, तब वो बोला, लड़कियां भी तो हैं चार। मैं सुनकर दंग रह गई कि क्या लड़कियों की गिनती बच्चों में नहीं की जा सकती। क्या वे इतनी गई बीती हैं कि माता-पिता ही उन्हें बच्चा नहीं मानते। आधुनिकता, विकास, तरक्की के सारे दावे, वादे और आंकड़े लड़कियों के साथ हो रहे भेदभाव पर आकर मानो थम से जाते हैं।

नारी घर-परिवार की केन्द्र-बिन्दु नारी घर-परिवार, समाज की केन्द्र-बिन्दु है। नारी ब्रह्मïांड की सर्वश्रेष्ठ कृति बच्चे को जन्म देती है, इसलिए उसे बराबरी का स्थान तो मिलना चाहिए। सामान्य भारतीय परिवारों में आज भी शिक्षा स्वास्थ्य अथवा अन्य सुविधा देने की बात आती है तो पुत्र को ही महत्व दिया जाता है। एक प्रतिभावान लडक़ी की पढ़ाई इसलिए छुड़वा दी जाती है क्योंकि भाई का पढऩा ज्यादा जरूरी है।

लड़कियों का महंगा इलाज नहीं केन्द्रीय मंत्री ने स्वयं इसका उदाहरण देते हुए बताया कि कैंसर अस्पताल में दौरे के दौरान 70 प्रतिशत लडक़े वहां अपना इलाज करा रहे थे, जबकि लड़कियों की संख्या काफी कम थी। इसका मतलब यह है कि घर-परिवार के लोग लड़कियों का महंगा इलाज नहीं करवाते है।

लडक़ी की मौत पर मुआवजा कुछ बरस पहले दिल्ली में सडक़ दुर्घटना में एक लडक़ी की मृत्यु पर ट्रिब्यूनल में मुआवजा देने से यह कहते हुए इन्कार कर दिया कि लडक़ी की मौत पर कैसा मुआवजा? वह तो स्वयं माता-पिता पर बोझ थी। हालांकि बाद में इस घटना पर हुए विवाद के बाद यह फैसला वापस लिया गया। पर इस घटना ने नारी को लेकर समाज की सोच को एक बार फिर उजागर कर दिया।

भेदभाव की शिकार तमाम विरोध विद्रोह और संघर्ष के बाद पढ़-लिख कर महिला चार दीवारी से बाहर निकलती भी है तो पग-पग, डगर-डगर उसे भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। एक सर्वे के अनुसार देश में 30-40 साल तक की कामकाजी महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले 30 प्रतिशत तक वेतन कम मिलता है वहीं 30 साल से कम उम्र की महिलाएं पुरुषों के मुकाबले 23 प्रतिशत तक कम वेतन पाती है। उसी प्रकार भारतीय महिलाएं पुुरुषों की अपेक्षा 50 प्रतिशत अधिक काम करती है जबकि वैश्विक औसत 39 प्रतिशत हैं। आंकड़ों के अनुसार देश की केवल 45 प्रतिशत कंपनियां ही महिलाओं को 9 से 12 सप्ताह का संवैतनिक मातृत्व अवकाश देती हैं।

देश की जीडीपी में बढ़ोतरी अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष का कहना है कि अगर कार्यक्षेत्र में महिलाएं भी पुरुषों के बराबर हो तो देश की जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद में 27 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो सकती है। देखा जाता है कि पढ़ी लिखी अधिकांश महिलाओं की आर्थिक आजादी का फैसला शादी के पहले पिता अथवा भाई और शादी के बाद पति या ससुराल के लोग करते हैं। मेरी एक परिचिता की इंजीनियर बेटी को शादी के बाद इसलिए नौकरी छोडऩी पड़ी क्योंकि उसके पति को उसका बाहर जाकर काम करना पसन्द नहीं था। बहुत दुख, शर्म और चिन्ता की बात है कि महिला को केवल इसलिए भेदभाव का शिकार होना पड़ रहा है क्योंकि वह महिला है। इसके खिलाफ महिलाओं को अपनी आवाज बुलन्द करनी होगी, अपनी आजादी के लिए संघर्ष करना होगा एक लम्बी ऊंची उड़ान के लिए अपने पंखों को मजबूती से फैलाना होगा, तभी मिलेगा उन्हें खुला आसमान।

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